اليوم السادس : عدم الإيمان، والعصيان، وعدم الرضا [ تأمل في سفر التثنية 1: 32] " فِي هَذَا الأَمْرِ لَمْ تُؤْمِنُوا بِالرَّبِّ إِلهِكُمْ ." ( تثنية 1: 32) إن الذين يؤمنون بالله يطيعون كلمته، والذين يطيعون كلمته يؤمنون به . وكلما أطعنا كلمة الله، اختبرنا حضوره بشكل أكبر، مما يقودنا حتماً إلى وضع ثقة أكبر فيه . وعلاوة على ذلك، فبينما نطيع الله، نزداد معرفةً وعمقاً بحقيقة من هو الله . وعلى النقيض من ذلك، فإن الذين لا يؤمنون بالله يعصون كلمته، والذين يعصون كلمته لا يؤمنون به . وكلما عصينا كلمة الله، قلّ اختبارنا لحضوره، مما يدفعنا حتماً إلى التمادي في عدم الإيمان . وعندما نعصي الله، نصبح جاهلين ليس فقط بطبيعته بل بأنفسنا أيضاً؛ وهذا يؤدي إلى قساوة القلب والكبرياء، مما يدفعنا إلى ارتكاب المزيد من الخطايا ضده . إن الثمار الآثمة التي تنتج عن عدم الإيمان بالله وعن الخطية ضده هي تحديداً العصيان وعدم ا...
छठा दिन: अविश्वास, आज्ञा न मानना और असंतोष [व्यवस्थाविवरण 1:32 पर मनन] "इस मामले में, तुमने अपने परमेश्वर यहोवा पर भरोसा नहीं किया।" (व्यवस्थाविवरण 1:32) जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उसके वचन को मानते हैं, और जो उसके वचन को मानते हैं, वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। हम जितना ज़्यादा परमेश्वर के वचन का पालन करते हैं, उतना ही ज़्यादा उसकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं, जिससे स्वाभाविक रूप से उस पर हमारा भरोसा और भी बढ़ जाता है। इसके अलावा, जैसे-जैसे हम परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं, हम गहराई से जान पाते हैं कि परमेश्वर असल में कौन है। इसके विपरीत, जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, वे उसके वचन को नहीं मानते, और जो उसके वचन को नहीं मानते, वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। हम जितना ज़्यादा परमेश्वर के वचन की अवहेलना करते हैं, उतना ही कम उसकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं, जिससे हम और भी ज़्यादा अविश्वास में डूबते चले जाते हैं। जब हम परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते, तो हम न केवल उसके स्वभाव से, बल्कि खुद से भी अनजान हो ...