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मैं अपने आप से कुछ भी नहीं कर सकता। केवल मेरे भीतर निवास करने वाला प्रभु ही सब कुछ कर सकता है।

  मैं अपने आप से कुछ भी नहीं कर सकता। केवल मेरे भीतर निवास करने वाला प्रभु ही सब कुछ कर सकता है।         “मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूँ, वैसा न्याय करता हूँ; और मेरा न्याय सच्चा है, क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजनेवाले की इच्छा चाहता हूँ।” (यूहन्ना 5:30)     (1) “यीशु पर विश्वास करने के लिए गवाही” शीर्षक के अंतर्गत मैंने यूहन्ना 5:30–47 तक के पूरे भाग को केवल कोरियाई बाइबल से पढ़ा। उसके बाद भी मेरे मन में बार-बार यह इच्छा जागती रही कि मैं केवल 30वें पद पर मनन करूँ। इसलिए आज मैं पहले केवल इसी एक पद पर मनन करना चाहता हूँ। इस मनन में मैं “मेरा न्याय”, अर्थात् प्रभु के न्याय पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूँ। साथ ही, प्रकाशितवाक्य 20:11–15 में वर्णित “बड़े श्वेत सिंहासन के न्याय” पर भी विचार करते हुए उससे मिलने वाली शिक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ।   (a) सबसे पहले, मैं यीशु के इन शब्दों पर मनन करना चाहता हूँ: “मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता” [ ο ὐ δύνα μ αι ἐ γ ὼ ποιε ῖ ν ἀ π ᾽ ἐ μ αυτο ῦ ο ὐ δέν ...

처남에게 그리스도의 편지가 되고 싶습니다.

 https://youtu.be/Wr_ZkV6DJUk?si=jrbA6yXUEbe5a2_m

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